खबर आम मुसलमान के लिए चिंता भरी है पर वह कुछ नहीं कर सकता। वह कांग्रेस, लालू या मुलायम सिंह याकि सेकुलर झंडाबरदारों से जवाब तलब नहीं कर सकता कि क्यों राज्यसभा चुनाव में एक मुसलमान को भी टिकट नहीं दिया गया? हां, कांग्रेस ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। न ही लालू-नीतीश-मुलायम सिंह की पार्टी से कोई टिकट। इनका एक मुसलमान उम्मीदवार नहीं और भाजपा से दो मुसलमान! मुख्तार अब्बास नकवी और एम जे अकबर भाजपा सांसद बनेंगे जबकि सेकुलर पार्टियों से एक भी मुस्लिम नहीं! सो कौन सेकुलर हुआ? भाजपा या कांग्रेस?

मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, नीतीश कुमार की किसी भी पार्टी से एक मुसलमान उम्मीदवार का न होना आज की सियासी हकीकत का खुलासा है। हिंदू की राजनीति करते हुए सत्ता में भी आया जा सकता है और मुस्लिम उम्मीदवार भी बन सकते हैं। मगर मुस्लिम राजनीति करके न आप हिंदू के वोट पा सकते हैं और न मुसलमान का भला कर सकते हैं। कांग्रेस और यूपीए ने दस साल जो राजनीति की उससे ये खुद बरबाद हुए और मुसलमान को भी हर तरह से हाशिए में डलवाया। आज संसद हो, विधानसभा या विधान परिषद या लाल बत्ती के तमाम उपक्रम, सभी में मुस्लिम प्रतिनिधित्व न्यूनतम है। क्यों? सीधे तौर पर जिम्मेवार संघ परिवार नहीं बल्कि सेकुलर पार्टियां हैं। इन्होंने राजनीति ऐसी की, ऐसा खेल रचा कि मुस्लिम न तीन में हैं और न पांच में! एक हिसाब से पूरा मामला मुस्लिम आबादी के वोट उपयोग के कारण है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और सेकुलर पार्टियों ने सत्ता में रहते हुए उन्हें खुश करने के काम किए तो वजह वोट लेना था। अब कांग्रेस बाहर है और कथित सांप्रदायिक संघ की सत्ता है तो कांग्रेस, मुलायम सिंह, लालू यादव में सोच है कि मुसलमान भला कहां जाएगा वह झक मार कर उन्हें वोट देगा। फिर भले उन्हें राज्यसभा, संसद या विधानसभा में लाया जाए या न लाया जाए।

मतलब भारत का मुसलमान बुनियादी तौर पर वोट का मोहरा है। सवाल है क्या यह स्थिति खुद मुसलमान ने नहीं बनाई हुई है? मुसलमान क्योंकि अपने को एक सियासी भेड़ चाल में बांधे रखता है इसलिए उसका उपयोग ले दे कर थोक वोट की एक दुकान है। इस पर सेकुलर राजनीति अपनी ठेकेदारी करती है तो भाजपा और संघ उस पर धुव्रीकरण करके हिंदू की राजनीति कर डालती है।

सो मुसलमान का भारत की राजनीति में सिर्फ उपयोग है! उसका अपना कोई स्वतंत्र वजूद, रोल नहीं है। हो भी नहीं सकता। मुसलमान ने अपने को क्योंकि अल्पसंख्यक के एक घेरे में बांध रखा है। उसके सियासी व्यवहार में कोई विविधता नहीं है इसलिए वह सिर्फ मोहरा है। बिसात में न किंग, न क्वीन, न घोड़ा,न ऊंट और न हाथी। उसका चरित्र सिर्फ मोहरे का है। इस बात को जरा पाकिस्तान के उदाहरण से समझा जाए। यह भी कह सकते हैं कि मुसलमान जहां बहुमत में है और वहां यदि लोकतंत्र है तो वह विविध अंदाज में राजनीति करता है। पाकिस्तान में भुट्टो की पार्टी में वह होता है तो शरीफ की पार्टी में भी है और इमरान खान की पार्टी या कट्टरपंथी जमायते में भी है तो सिंध, बलोच की पार्टियों से भी उसके रास्ते हैं। विविध रास्ते और उसकी विविध रूझान से उसके मौके सबसे हैं।

भारत में भी यह संभव है मगर भारत में वह बंधा हुआ है। उसने अपने को अल्पसंख्यक घेरे और हिंदू राजनीति के खौफ में बांध रखा है। एक हिसाब से कांग्रेस ने, भारत की कथित सेकुलर राजनीति ने उसका ऐसा चरित्र बनवा दिया है। मुसलमान ने कभी सोचा ही नहीं कि यदि मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज हुसैन या एमजे अकबर भाजपा में राजनीति करके सत्ता में बैठे रह सकते हैं तो बाकि और मुसलमान क्यों नहीं भाजपा में सत्ता पा सकते हैं? यदि भाजपा और संघ पीडीपी, मुफ्ती मोहम्मद और मेहबूबा मुफ्ती के साथ सत्ता साझा कर सकते हैं तो इसका अर्थ तो राजनीति खुली हुई है। ऑप्सन सब तरह के हैं। राजनीति संभावनाओं का खेल है तो क्यों न मुसलमान भाजपा का टेकओवर कर डाले!

अब यह वाक्य अति है। इसका भावार्थ है कि मुसलमान ने अपने को क्यों बांधा हुआ है? हिसाब से आज जामा मसजिद के इमाम को मुख्तार अब्बास, महबूबा मुफ्ती, शाहनवाज, एमजे अकबर को बुला कर अभिनंदन करना चाहिए कि वाह भाजपा के साथ क्या खूब राजनीति की! बाकी भी ऐसे करें। वह बंधेगा तो कुछ नहीं पाएगा और खुलेगा तो सब पाएगा।

यह गंभीर और समझने वाली बात है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने यूपीए के राज में भगवा आतंक की राजनीति कर हिंदुओं के खिलाफ जो अतिवाद किया वह कुल मिला कर मुस्लिम के थोक वोट की राजनीति थी। कांग्रेस उसमें खुद डूबी और अपने साथ अपने बंधुओं को भी ले डूबी! मुसलमानों को एक अल्पसंख्यक मंत्रालय और नरेंद्र मोदी व अमित शाह के खिलाफ कार्रवाई का कुछ संतोष भले मिला हो लेकिन उससे उसका कुल जमा नुकसान बहुत भारी हुआ है। इसे न मुस्लिम समाज और उसके बुद्धिजीवी समझ पाया है और न भारत का बौद्धिक विमर्श।

अपना निष्कर्ष है कि भारत में राज करना है तो हिंदुओं की राजनीति करनी होगी और उसमें मुसलमान को विविधता के साथ अपने पैंतरे चलने होंगे। अपने को खुला रखना होगा। एमजे अकबर, महबूबा मुफ्ती बनना होगा। सत्ता में भागीदारी, साझेदारी तो तभी बनेगी जब बहुसंख्यक के साथ आप कंधे से कंधा मिला कर, राजनैतिक दांवपेंच करके राजनीति करें। अन्यथा बद्दरूद्दीन अजमल, ओवैसी का हश्र सामने है तो राहुल, लालू –मुलायम के यहां की हैसियत भी सामने है!

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